भाषा के कितने भेद होते हैं

Bhasha ke kitne bhed hote hain ( भाषा के कितने भेद होते हैं ) मनुष्य प्रारंभिक समय में जब वो पहली बार इंसान में इवॉल्व हुआ होगा तो सायद अपने पूर्वज वानोरो के तरह आवाज निकाल कर एक दूसरे के साथ अपने भाव के आदान प्रदान करता होगा। 

बीतते समय के साथ साथ वो हर एक चीज और घटना को बयां करने के लिए अलग अलग आवाज का सहारा लेता होगा और इस क्रम में ही वो बोलना सिख होगा।

पुरे एवोलुशन के प्रोसेस को तो हमने 2-4 लाइन में लिखदिये मगर यह होते होते हजार साल जरूर लगे होंगे। इसी तरह ही भाषा का क्रम विकास हुआ होगा।

भाषा किसे कहते है?

ऐसे तो भाषा की परिभाषा भिन्न भिन्न पुस्तकों में आपको भिन्न भिन्न मिलेंगे मगर सरल भाषा में समझे तो ” अपने मन के भावना और विचार को सब्दों में प्रकाश करने को हम भाषा कहते है” ।

मान लीजिए आपको पानी पीना है और आप पानी अपने माँ से मांगे वाले है तो आप कुछ तो कहेंगे अपने माँ से बस यही भाषा है। दुनिया की अलग अलग क्षेत्रो में अलग अलग भाषा का प्रचलन है यह तो सबको मालूम ही होगा।

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हमे भाषा की जरुरत क्यों है?

आखिरकार हमे भाषा की जरुरत क्यों है? क्या हम बिना भाषा के जी नही सकते या फिर सांकेतिक रूप जिसे हम साइन लैंगुएज भी कहते है उसका इस्तेमाल कर नहीं सकते? जी हां कर तो सकते है.

मगर सोचिये इसके लिए हमे कितने सब्दों और संकेतों को याद लड़ना होगा। और कहीं हमे कॉल करना हो या चिठ्ठी भेजना हो तो हम क्या करेंगे। भाषा ही सबसे सरल और बहतरीन तरीका है एक दूसरे से भाव विनिमय करने के लिए।

भाषा के कितने भेद होते है?

भाषा के कितने भेद होते है यह जानने से पहले हमें भेद क्या है यह समझना होगा। भेद किसी भी प्रकार को कहते है। एक भाषा को प्रकाश करने के कितने प्रकार और माध्यम को हम भाषा के भेद कहते है।

मूलतः भाषा के २ ही प्रकार के भेद होते है, जैसे की-

  1. लिखित रूप
  2. मौखिक रूप

कहीं कही जगहों पर आपको भाषा के ३ स्वरुप भी बताया जाता है, जिनमे के सांकेतिक रूप भी शामिल होता है। चलिये इस बारे में बिस्तार से आलोचना करते है।

भाषा का लिखित रूप

हम जब कभी अपने मन के विचार या फिर भाव को लिखकर प्रकाश करते है उसे भाषा का लिखित रूप कहा जाता है। कोई भी भाषा जैसे की हिंदी, पंजाबी, ओड़िआ, एन्ग्रेजी, जर्मन आदि भाषा के लिखित रूप से आप परिचित जरूर होंगे।

प्रारंभिक दौर में कोई भाषा का लिखित रूप नहीं हुआ करता था। समय के साथ साथ अपने विचार और तथ्यों को संभाल के रखने के लिए मनुष्य ने कुछ संकेत का इस्तेमाल करना सुरु किया। बीतते समय के साथ साथ यह निर्दिष्ट आकार लेने लगी और उससे ही भाषा के लिखित रूप का उद्भवन हुआ।

चिठियां लिखने के लिए, किताब लिखने के लिए या फिर जरुरी तथ्यों को संभल कर रखने के लिए यह काफी कारगर है।

भाषा के मौखिक रूप

भाषा के मौखिक रूप एक दूसरे के साथ भाव के आदान प्रदान में काफी कारगर है। भाषा के लिखित रूप से पहले मौखिक रूप का सुरूवात हुआ था। एक दूसरे के साथ बतचित करना हो या फिर पढ़ना ये सब में मौखिक रूप की अबस्यक्ता हमे अनुभव होता है।

सांकेतिक रूप

ऐसे तो सांकेतिक रूप को हम किसी भी भाषा के साथ जोड़ नहीं सकते है क्यों के लगभग हर भाषा में सांकेतिक रूप एक सामान होता है। बस कुछ कुछ प्रान्तों के कुछ विशेष संकेत होता है किसी चीज के लिए।

आपने क्या सीखा ?

हमे आशा है की आपको Bhasha ke kitne bhed hote hain ( भाषा के कितने भेद होते हैं ) विषय के बारे में दी गई जानकारी अच्छी लगी होगी। अगर आपको इस विषय के बारे में कोई Doubts है तो वो आप हमे नीचे कमेंट कर के बता सकते है। आपके इन्ही विचारों से हमें कुछ सीखने और कुछ सुधारने का मोका मिलेगा।

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